भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और देश के प्रमुख कृषि विश्वविद्यालयों ने हाल ही में गेहूं की दो नई उन्नत किस्में विकसित की हैं जो किसानों के लिए गेम-चेंजर साबित हो सकती हैं। ये किस्में पारंपरिक किस्मों से पूरी तरह अलग हैं और कम पानी, कम खाद में भी बंपर उत्पादन देने की क्षमता रखती हैं।

नई किस्मों का विवरण
| विशेषता | किस्म 1: HD-3410 | किस्म 2: PBW-825 |
|---|---|---|
| विकसितकर्ता | ICAR-भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान, करनाल | पंजाब कृषि विश्वविद्यालय, लुधियाना |
| मुख्य विशेषता | जलवायु परिवर्तन सहनशील | रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक |
| उत्पादन क्षमता | 55-60 क्विंटल/हेक्टेयर | 58-63 क्विंटल/हेक्टेयर |
| पकने की अवधि | 110-115 दिन | 105-110 दिन |
| पानी की आवश्यकता | 4-5 सिंचाई (सामान्य से 30% कम) | 3-4 सिंचाई (सामान्य से 40% कम) |
| प्रमुख रोग प्रतिरोध | रस्ट, कर्ण बंट | पीला रस्ट, खुला बंट |
ये किस्में पारंपरिक किस्मों से कैसे अलग हैं?
1. जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशीलता
- तापमान में उतार-चढ़ाव सहने की क्षमता
- देर से बुवाई के लिए उपयुक्त
- अनिश्चित वर्षा में भी अच्छा उत्पादन
2. कम पानी में अधिक उत्पादन
- गहरी जड़ प्रणाली
- मृदा नमी का कुशल उपयोग
- वाटर यूज एफिशिएंसी: 1 किलो गेहूं के लिए केवल 800-900 लीटर पानी (सामान्य: 1200-1500 लीटर)
3. रोग प्रतिरोधक क्षमता
- जैव प्रौद्योगिकी द्वारा विकसित
- प्राकृतिक प्रतिरोध जीन्स
- कीटनाशकों पर निर्भरता 60-70% कम
4. उत्पादन लागत में कमी
- कम सिंचाई → बिजली/डीजल बचत
- कम दवाईयाँ → स्वास्थ्य एवं पर्यावरण हितैषी
- कम खाद आवश्यकता
आर्थिक लाभ विश्लेषण (प्रति हेक्टेयर)
| मापदंड | पारंपरिक किस्म | नई किस्म (HD-3410/PBW-825) | लाभ |
|---|---|---|---|
| बीज दर | 100 किलो | 90 किलो | 10% बचत |
| सिंचाई | 6-7 बार | 3-4 बार | 40-50% पानी बचत |
| खाद | 120:60:40 NPK | 100:50:30 NPK | 15-20% बचत |
| रोग नियंत्रण | 3-4 स्प्रे | 1-2 स्प्रे | 50% बचत |
| उत्पादन | 45-50 क्विंटल | 55-63 क्विंटल | 20-25% वृद्धि |
| शुद्ध आय | ₹45,000-50,000 | ₹65,000-75,000 | ₹15,000-25,000 अधिक |
बुवाई और प्रबंधन गाइड
उपयुक्त क्षेत्र:
- HD-3410: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा
- PBW-825: पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश
बुवाई का समय:
- समय पर बुवाई: 25 अक्टूबर – 15 नवंबर
- देर से बुवाई: 15 नवंबर – 10 दिसंबर (दोनों किस्में उपयुक्त)
बीज दर एवं दूरी:
- बीज दर: 90-100 किलो प्रति हेक्टेयर
- पंक्ति से पंक्ति: 20-22 सेमी
- बीज की गहराई: 4-5 सेमी
खाद प्रबंधन:
- बुवाई के समय: 50:25:15 NPK
- पहली सिंचाई पर: 25:15:10 NPK
- दूसरी सिंचाई पर: 25:10:5 NPK
सामान्य प्रश्न (FAQ)
Q1: ये नई किस्में कहाँ से मिलेंगी?
A: राज्य सरकारों के कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), और प्रमाणित बीज विक्रेताओं से। सरकारी रेट पर ₹25-30 प्रति किलो।
Q2: क्या ये किस्में जैविक खेती के लिए उपयुक्त हैं?
A: हाँ, दोनों किस्में जैविक खेती के लिए उत्तम हैं क्योंकि इनमें प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक है।
Q3: कम पानी में भी अच्छा उत्पादन कैसे देती हैं?
A: इनकी जड़ें गहरी जाती हैं और मृदा नमी का कुशल उपयोग करती हैं। पत्तियों पर मोमी परत होने से वाष्पीकरण कम होता है।
Q4: जलवायु परिवर्तन का असर नहीं होने का क्या मतलब है?
A: ये किस्में उच्च तापमान (35-38°C) और अनियमित वर्षा को सहन कर सकती हैं। इनमें “हीट शॉक प्रोटीन” जीन्स हैं।
Q5: क्या इन किस्मों से बीज बचाकर अगले साल बो सकते हैं?
A: हाँ, ये स्व-परागित किस्में हैं। अगले 2-3 साल तक अपना बीज बचाकर बो सकते हैं, लेकिन उसके बाद नए प्रमाणित बीज लेने चाहिए।
Q6: रोग प्रतिरोधक क्षमता कितने समय तक रहेगी?
A: वैज्ञानिकों के अनुसार, अगले 5-7 वर्षों तक ये किस्में प्रमुख रोगों के प्रति प्रतिरोधी रहेंगी।
Q7: क्या ये किस्में सभी प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती हैं?
A: दोमट से भारी दोमट मिट्टी इनके लिए आदर्श है। हल्की रेतीली मिट्टी में अधिक सिंचाई की आवश्यकता होगी।
सरकारी सहायता योजनाएँ
- राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन: बीज पर 50% सब्सिडी
- परंपरागत कृषि विकास योजना: जैविक खेती को प्रोत्साहन
- प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना: ड्रिप/स्प्रिंकलर पर 55% अनुदान
- बीज वितरण कार्यक्रम: सरकारी मूल्य पर बीज उपलब्धता
सफलता की कहानी: हरियाणा के किसान
हरियाणा के करनाल जिले के किसान सुरेश कुमार ने पिछले सीजन में HD-3410 किस्म को 2 हेक्टेयर में बोया। उन्हें 58 क्विंटल/हेक्टेयर उत्पादन मिला जबकि पड़ोसी के खेत में पारंपरिक किस्म से केवल 42 क्विंटल/हेक्टेयर मिला। सुरेश ने 4 सिंचाई में ही फसल तैयार की और ₹1,30,000 अतिरिक्त लाभ कमाया।
संभावनाएँ
इन नई किस्मों से:
- पानी की बचत: प्रति हेक्टेयर 10-12 लाख लीटर
- कीटनाशक कमी: पर्यावरण संरक्षण
- खाद्य सुरक्षा: बढ़ती आबादी के लिए अनाज
- किसान आय: उत्पादन लागत कम, लाभ अधिक
निष्कर्ष
गेहूं की ये दो नई किस्में HD-3410 और PBW-825 भारतीय कृषि के लिए एक नए युग की शुरुआत कर रही हैं। जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच ये किस्में किसानों के लिए वरदान साबित हो सकती हैं। कम संसाधनों में अधिक उत्पादन, बेहतर रोग प्रतिरोध और पर्यावरण अनुकूलता इन्हें भविष्य की फसल बनाती हैं।
सलाह: पूरे क्षेत्र में एक साथ न बोएं। पहले 0.5-1 हेक्टेयर में प्रयोग करें, परिणाम देखें, फिर पूरे क्षेत्र में बोएं।
अस्वीकरण: उपरोक्त जानकारी कृषि विभाग के आंकड़ों पर आधारित है। स्थानीय जलवायु और मृदा के अनुसार कृषि विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें।