ईसबगोल की खेती से अंधा पैसा कमा सकते हैं किसान: 80 क्विंटल उत्पादन और 8,000 रुपए प्रति क्विंटल है कीमत, जानिए कैसे करें खेती

नमस्ते किसान भाइयों और बहनों,

क्या आप एक ऐसी औषधीय फसल की तलाश में हैं जिसकी बाजार में हमेशा मांग रहती हो, कीमत स्थिर हो और मुनाफा इतना अधिक हो कि आपकी आर्थिक स्थिति ही बदल जाए? तो आपके लिए ईसबगोल (Psyllium/Isabgol) की खेती एक सुनहरा अवसर है। वर्तमान में ईसबगोल का बाजार भाव 7,000-8,000 रुपए प्रति क्विंटल है और एक हेक्टेयर से 70-80 क्विंटल तक उत्पादन लिया जा सकता है।

Farmers can earn huge money from Isabgol cultivation.

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क्यों ईसबगोल है “अंधा पैसा” कमाने का राज?

ईसबगोल (Plantago ovata) एक महत्वपूर्ण औषधीय फसल है जिसके बीजों का उपयोग आयुर्वेदिक दवाओं, फार्मास्यूटिकल्स, हेल्थ सप्लीमेंट्स और कोस्मेटिक उद्योग में होता है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा ईसबगोल उत्पादक और निर्यातक देश है।

मुख्य लाभ:

  • उच्च बाजार मूल्य: ₹7,000-₹8,000 प्रति क्विंटल
  • कम जोखिम: बीमारियों और कीटों का प्रकोप कम
  • कम पानी की आवश्यकता: रेतीली जमीन में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है
  • अंतर्राष्ट्रीय मांग: अमेरिका, यूरोप, जापान में भारी मांग
  • लागत कम, मुनाफा अधिक: 1 हेक्टेयर से 4-5 लाख रुपए तक शुद्ध लाभ

ईसबगोल की उन्नत किस्में

क्रमकिस्म का नामविकसितकर्तापकने की अवधि (दिन)औसत उपज (क्विंटल/हेक्टेयर)विशेषताएं
1गुजरात इसबगोल-1जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय110-12018-20उच्च उपज, बड़े दाने
2गुजरात इसबगोल-2जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय105-11016-18रोग प्रतिरोधी, उच्च गुणवत्ता
3आईसी 111786आईसीएआर115-12020-22सूखा सहनशील, उच्च उपज
4आरआई 89राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय110-11515-17कम पानी में उगाने योग्य
5एचआई 5हिसार कृषि विश्वविद्यालय120-12517-19उत्तरी भारत के लिए उपयुक्त

नोट: गुजरात इसबगोल-1 और 2 किस्में सबसे लोकप्रिय हैं और इनकी उपज क्षमता सबसे अधिक है। ये किस्में विशेष रूप से गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के लिए विकसित की गई हैं।


1 हेक्टेयर में ईसबगोल की खेती: लागत और आय विश्लेषण

क्र.सं.आय/व्यय का मदविवरणअनुमानित राशि (₹ में)
A. एक बार की लागत
1.खेत तैयारी (2 जुताई, पाटा)5,000
2.ईसबगोल बीज (उन्नत किस्म)5 किलो × ₹400/किलो2,000
3.जैविक खाद (गोबर खाद)10 टन × ₹500/टन5,000
4.रासायनिक उर्वरक (NPK)6,000
5.कीटनाशक/फफूंदनाशक4,000
कुल एक बार की लागत22,000
B. चलने वाली लागत
1.सिंचाई (3-4 बार)4,000
2.निराई-गुड़ाई (2 बार)6,000
3.कटाई व ओसाई मजदूरी15,000
4.परिवहन व विपणन8,000
5.भंडारण व पैकेजिंग5,000
कुल चलने वाली लागत38,000
C. कुल लागत (A+B)60,000
D. आय
1.उत्पादन75-80 क्विंटल/हेक्टेयर (औसत)
2.बाजार भावऔसत ₹7,500/क्विंटल
3.कुल आय (77.5 क्विंटल)77.5 × 7,5005,81,250
E. शुद्ध लाभकुल आय – कुल लागत5,81,250 – 60,0005,21,250
F. अनुमानित अतिरिक्त आयभूसी/चोकर बेचकर50,000-70,000
G. कुल संभावित शुद्ध लाभE + F5.7-5.9 लाख

नोट: यह गणना 1 हेक्टेयर (2.5 एकड़) के लिए है। यदि आप 1 एकड़ में खेती करते हैं तो लागत और आय लगभग 40% होगी। ईसबगोल की खेती मुख्य रूप से गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में होती है, लेकिन उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के रेतीले इलाकों में भी सफलतापूर्वक की जा सकती है।

ईसबगोल की उन्नत खेती का वैज्ञानिक तरीका

1. जलवायु और मिट्टी

  • जलवायु: शीतोष्ण और शुष्क जलवायु उपयुक्त
  • तापमान: 20-30°C (अधिक तापमान या पाला हानिकारक)
  • मिट्टी: रेतीली दोमट या दोमट मिट्टी सर्वोत्तम
  • pH मान: 7.0-8.0 (क्षारीय मिट्टी में भी उगाया जा सकता है)
  • जल निकास: उत्तम जल निकास वाली भूमि चुनें

2. खेत की तैयारी

  • पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें
  • 2-3 जुताई हैरो या कल्टीवेटर से करके मिट्टी को भुरभुरा बनाएं
  • पाटा लगाकर खेत समतल करें
  • बुवाई से 15-20 दिन पहले 8-10 टन गोबर की सड़ी खाद प्रति हेक्टेयर मिलाएं

3. बुवाई का समय और विधि

  • बुवाई का उत्तम समय: नवंबर का दूसरा पखवाड़ा
  • देरी से बुवाई (दिसंबर) में उपज कम होती है
  • बीज दर: 4-5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
  • बीज उपचार: कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलो बीज से उपचारित करें
  • बुवाई विधि: छिड़काव या ड्रिल विधि
  • कतार से कतार दूरी: 20-25 सेमी
  • बीज की गहराई: 1-2 सेमी

4. सिंचाई प्रबंधन

  • पहली सिंचाई: बुवाई के तुरंत बाद (हल्की)
  • दूसरी सिंचाई: बुवाई के 20-25 दिन बाद
  • तीसरी सिंचाई: फूल आने की अवस्था (45-50 दिन बाद)
  • चौथी सिंचाई: दाना भरने की अवस्था (70-75 दिन बाद)
  • सावधानी: फसल परिपक्वता के समय सिंचाई न करें

5. उर्वरक प्रबंधन

  • आधार खाद: बुवाई से पहले 40:60:20 किलो NPK प्रति हेक्टेयर
  • टॉप ड्रेसिंग: फूल आने से पहले 20 किलो यूरिया प्रति हेक्टेयर
  • सूक्ष्म पोषक तत्व: बोरॉन 2 किलो और जिंक 5 किलो प्रति हेक्टेयर
  • जैविक खेती के लिए: वर्मीकम्पोस्ट 5 टन + नीम की खली 10 क्विंटल

6. खरपतवार नियंत्रण

  • पहली निराई: बुवाई के 20-25 दिन बाद
  • दूसरी निराई: 40-45 दिन बाद
  • रासायनिक नियंत्रण: बुवाई के तुरंत बाद पेंडीमेथिलिन 30 ईसी (1 लीटर प्रति हेक्टेयर) का छिड़काव

7. कीट एवं रोग प्रबंधन

  • प्रमुख कीट: एफिड, सफेद मक्खी, लीफ माइनर
  • प्रमुख रोग: पाउडरी मिल्ड्यू, जड़ सड़न, अंगमारी
  • जैविक नियंत्रण:
  • नीम तेल (5 मिली/लीटर पानी) का छिड़काव
  • ट्राइकोडर्मा से बीज उपचार
  • फेरोमोन ट्रैप की स्थापना
  • रासायनिक नियंत्रण:
  • पाउडरी मिल्ड्यू: घुलनशील गंधक 0.2% का छिड़काव
  • एफिड: इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मिली/लीटर

8. कटाई और ओसाई

  • कटाई का समय: बुवाई के 110-120 दिन बाद
  • संकेत: पौधे पीले पड़ जाएं, बीज सख्त हो जाएं
  • कटाई विधि: पौधों को जड़ से उखाड़ें या काटें
  • ओसाई: 3-4 दिन धूप में सुखाएं, फिर डंडों से पीटकर या थ्रेशर से दाने अलग करें
  • सफाई: ओसाई के बाद दानों को साफ करके भंडारण करें

9. भंडारण और पैकेजिंग

  • दानों को अच्छी तरह सुखाएं (नमी 8-10%)
  • एयरटाइट बर्तन या प्लास्टिक की बोरियों में भरें
  • भंडारण से पहले दानों को फ्यूमिगेट करें
  • ठंडी, सूखी और अंधेरी जगह पर रखें

10. बाजार और विपणन

  • स्थानीय बाजार: आयुर्वेदिक दवा दुकानें, बीज विक्रेता
  • थोक बाजार: गुजरात, राजस्थान के मंडी केंद्र
  • निर्यात: निर्यातक कंपनियों को सीधे बेचें
  • ऑनलाइन: ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर बेचें

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

Q1. ईसबगोल की खेती के लिए कौन सा क्षेत्र उपयुक्त है?

उत्तर: ईसबगोल की खेती मुख्य रूप से गुजरात (मेहसाणा, बनासकांठा, साबरकांठा), राजस्थान (बाड़मेर, जालौर, सिरोही) और मध्य प्रदेश (रतलाम, मंदसौर) में की जाती है। हालाँकि, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के रेतीले इलाकों में भी सफलतापूर्वक उगाया जा सकता है।

Q2. बीज कहाँ से मिलेंगे और क्या प्रमाणित बीज जरूरी है?

उत्तर:

  • बीज स्रोत: गुजरात कृषि विश्वविद्यालय, जूनागढ़; राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय, जोधपुर; प्रमाणित बीज विक्रेता
  • प्रमाणित बीज के लाभ: अंकुरण दर 85-90%, शुद्ध किस्म, रोग मुक्त, उच्च उपज
  • मूल्य: ₹350-500 प्रति किलो (किस्म और गुणवत्ता के अनुसार)
  • सलाह: हमेशा प्रमाणित बीज ही खरीदें, घर के बचे बीज उपज कम देते हैं

Q3. ईसबगोल की बुवाई का सबसे अच्छा समय क्या है?

उत्तर:

  • उत्तरी भारत के लिए: नवंबर का दूसरा पखवाड़ा (15 नवंबर से 30 नवंबर)
  • दक्षिण भारत के लिए: नवंबर-दिसंबर
  • सावधानी: जल्दी बुवाई (अक्टूबर) में पौधे अधिक बढ़ते हैं और गिरने की संभावना रहती है। देरी से बुवाई (जनवरी) में उपज कम होती है।

Q4. क्या ईसबगोल की खेती कम पानी वाले क्षेत्रों में की जा सकती है?

उत्तर: हाँ, ईसबगोल एक कम पानी वाली फसल है। इसे केवल 3-4 सिंचाई की आवश्यकता होती है। यह सूखा सहनशील फसल है और रेतीली जमीन में भी अच्छी उपज देती है। ड्रिप इरिगेशन से और भी पानी बचाया जा सकता है।

Q5. ईसबगोल की फसल में कौन-कौन से रोग लगते हैं और उनकी रोकथाम कैसे करें?

उत्तर:
मुख्य रोग:

  1. पाउडरी मिल्ड्यू: पत्तों पर सफेद पाउडर जैसा दिखाई देता है
  • रोकथाम: खेत में हवा का संचार अच्छा रखें, घुलनशील गंधक 0.2% का छिड़काव
  1. जड़ सड़न: पौधे मुरझा जाते हैं, जड़ें सड़ जाती हैं
  • रोकथाम: जल निकास अच्छा रखें, ट्राइकोडर्मा से बीज उपचार करें
  1. अंगमारी: पत्तों पर भूरे धब्बे
  • रोकथाम: मैन्कोजेब 0.25% का छिड़काव

Q6. ईसबगोल के बाजार भाव कैसे रहते हैं?

उत्तर:

  • न्यूनतम बाजार मूल्य: ₹6,000-7,000 प्रति क्विंटल
  • औसत बाजार मूल्य: ₹7,000-8,000 प्रति क्विंटल
  • उच्च गुणवत्ता का भाव: ₹8,000-10,000 प्रति क्विंटल
  • निर्यात गुणवत्ता: ₹10,000-12,000 प्रति क्विंटल
  • महत्वपूर्ण: सितंबर-अक्टूबर में भाव सबसे अधिक रहते हैं क्योंकि इस समय पुरानी फसल खत्म होती है और नई फसल आने में समय होता है।

Q7. क्या ईसबगोल की खेती के लिए सरकारी सहायता मिल सकती है?

उत्तर: हाँ, विभिन्न योजनाओं के तहत:

  1. राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड: औषधीय पौधों की खेती के लिए वित्तीय सहायता
  2. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना: ड्रिप/स्प्रिंकलर पर 50-80% सब्सिडी
  3. राष्ट्रीय कृषि विकास योजना: बीज, खाद पर सहायता
  4. किसान क्रेडिट कार्ड: खेती के लिए ऋण सुविधा
  5. फसल बीमा योजना: फसल नुकसान पर बीमा

Q8. ईसबगोल की खेती में सबसे बड़ी चुनौती क्या है और उसका समाधान?

उत्तर:

  • चुनौती 1: अधिक वर्षा या अधिक सिंचाई से फसल गिरना (लॉजिंग)
  • समाधान: उचित सिंचाई प्रबंधन, जल निकास का ध्यान रखें
  • चुनौती 2: पक्षियों द्वारा बीजों को खा लेना
  • समाधान: खेत में डरावने (स्केयर क्रो) लगाएं, नेट का प्रयोग करें
  • चुनौती 3: बाजार में उचित मूल्य न मिलना
  • समाधान: सीधे निर्यातकों या प्रसंस्करण इकाइयों को बेचें, सहकारी समिति बनाएं

Q9. क्या ईसबगोल की खेती जैविक तरीके से की जा सकती है?

उत्तर: हाँ, ईसबगोल जैविक खेती के लिए आदर्श फसल है। जैविक ईसबगोल का बाजार भाव 30-50% अधिक मिलता है। जैविक खेती के लिए:

  • जैविक खाद: गोबर खाद, वर्मीकम्पोस्ट, जीवामृत
  • जैविक कीटनाशक: नीम तेल, गौमूत्र, लहसुन का घोल
  • प्रमाणन: जैविक प्रमाणन लेकर उच्च मूल्य प्राप्त करें

Q10. ईसबगोल से अतिरिक्त आय कैसे बढ़ाएं?

उत्तर:

  1. मूल्य संवर्धन: ईसबगोल भूसी (हस्क) अलग करके बेचें (भूसी का भाव ₹200-300 प्रति किलो)
  2. प्रसंस्करण: पाउडर, कैप्सूल, टेबलेट बनाकर बेचें
  3. सीधी बिक्री: ऑनलाइन प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया, अपनी वेबसाइट
  4. निर्यात: जैविक ईसबगोल का निर्यात करें (यूरोप, अमेरिका, जापान में मांग)
  5. अंतरवर्ती खेती: ईसबगोल के साथ सौंफ, जीरा, धनिया उगाएं

औषधीय खेती का सुनहरा अवसर

किसान भाइयों, ईसबगोल की खेती कम लागत और अधिक मुनाफे वाली खेती का उत्तम उदाहरण है। यह छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष रूप से लाभदायक है क्योंकि इसमें निवेश कम है और रिटर्न अधिक। भारत द्वारा विश्व के 80% ईसबगोल का उत्पादन किया जाता है, इसलिए बाजार की कोई कमी नहीं है।

सफलता के मंत्र:

  1. सही किस्म चुनें: गुजरात इसबगोल-1 या 2
  2. सही समय पर बुवाई: नवंबर का दूसरा पखवाड़ा
  3. वैज्ञानिक तरीका अपनाएं: संतुलित उर्वरक, उचित सिंचाई
  4. बाजार शोध करें: पहले से खरीदार ढूंढ लें

आज ही शुरुआत करें:

  • छोटे स्तर (0.5 हेक्टेयर) से प्रयोग शुरू करें
  • स्थानीय कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र से प्रशिक्षण लें
  • अनुभवी किसानों से सलाह लें
  • बीमा अवश्य कराएं

याद रखें, परंपरागत फसलों से हटकर औषधीय फसलें ही भविष्य की खेती हैं। ईसबगोल आपकी आर्थिक स्थिति बदलने की क्षमता रखता है।

इस रबी सीजन में ईसबगोल की खेती को अपनाएं और “अंधा पैसा” कमाने का सपना साकार करें!

शुभकामनाओं सहित…
~ आपका कृषि मार्गदर्शक

अनुभव साझा करें: यदि आप पहले से ही ईसबगोल की खेती कर रहे हैं, तो कृपया अपने अनुभव नीचे कमेंट में साझा करें। आपका अनुभव अन्य किसानों के लिए मार्गदर्शन करेगा।

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