अरहर (पिजन पी) भारत की एक प्रमुख दलहनी फसल है जो खरीफ के मौसम में उगाई जाती है। यह न सिर्फ पोषण से भरपूर है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में भी सहायक है। सही वैज्ञानिक तरीके से खेती करके किसान अरहर की पैदावार दोगुनी कर सकते हैं। इस लेख में हम खरीफ सीजन में अरहर की उन्नत खेती की पूरी प्रक्रिया – भूमि की तैयारी से लेकर खाद, सिंचाई और फसल प्रबंधन तक – विस्तार से जानेंगे।

अरहर की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी
अरहर की खेती के लिए गर्म और आर्द्र जलवायु उपयुक्त होती है। बुवाई के समय तापमान 30-35°C और फसल पकने के समय शुष्क मौसम आदर्श माना जाता है। अरहर लगभग सभी प्रकार की मिट्टी में उगाई जा सकती है, लेकिन दोमट मिट्टी जिसमें जल निकासी की उचित व्यवस्था हो, सबसे बेहतर होती है। मिट्टी का pH मान 6.5-7.5 के बीच उपयुक्त रहता है।
उन्नत किस्मों का चयन
पैदावार बढ़ाने के लिए उन्नत किस्मों का चुनाव महत्वपूर्ण है:
अल्प अवधि किस्में (120-140 दिन):
- पूसा अर्का: 130-140 दिन में पकने वाली, प्रति हेक्टेयर 20-25 क्विंटल उपज
- पारस: 125-130 दिन, रोग प्रतिरोधी, 18-22 क्विंटल/हेक्टेयर
मध्यम अवधि किस्में (150-180 दिन):
- पंत अरहर-5: 160-170 दिन, 25-30 क्विंटल/हेक्टेयर
- बहार: 150-160 दिन, फ्यूजेरियम विल्ट के प्रति सहनशील
दीर्घ अवधि किस्में (180 दिन से अधिक):
- मालवीय चमत्कार: 180-190 दिन, 30-35 क्विंटल/हेक्टेयर
- आशा (ICP-8863): 185-195 दिन, उच्च प्रोटीन युक्त
भूमि की तैयारी और जुताई
भूमि की उचित तैयारी अरहर की अच्छी पैदावार की नींव है:
- पहली जुताई: मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें (गर्मियों में)
- दूसरी जुताई: पहली बारिश के बाद कल्टीवेटर या देशी हल से
- तीसरी जुताई: रोटावेटर या हैरो से, मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए
- अंतिम जुताई: पाटा लगाकर भूमि समतल करें
विशेष सुझाव: अंतिम जुताई के समय प्रति हेक्टेयर 10-15 टन अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाएं।
बुवाई का समय और तरीका
खरीफ सीजन में अरहर की बुवाई का उचित समय जून के अंत से जुलाई के मध्य तक है। देर से बुवाई करने पर पैदावार प्रभावित होती है।
बुवाई के तरीके:
- कतार में बुवाई: कतार से कतार की दूरी 45-60 सेमी और पौधे से पौधे की दूरी 15-20 सेमी रखें
- बीज दर: 12-15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर
- बीज उपचार: थीरम या कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें
- राइजोबियम कल्चर: 200 ग्राम कल्चर को 10 किलो बीज के लिए प्रयोग करें
खाद और उर्वरक प्रबंधन
संतुलित खाद प्रबंधन से उत्पादन में 40-50% वृद्धि संभव है:
आधार खाद (बुवाई के समय):
- नाइट्रोजन: 20 किग्रा/हेक्टेयर
- फास्फोरस: 50 किग्रा/हेक्टेयर
- पोटाश: 20 किग्रा/हेक्टेयर
- जिंक सल्फेट: 25 किग्रा/हेक्टेयर (जस्ते की कमी वाली भूमि में)
शीर्ष ड्रेसिंग:
- फूल आने की अवस्था में: 20 किग्रा नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर
- 2% यूरिया का घोल फूल आने पर छिड़काव
टिप: जैविक खेती के लिए वर्मीकम्पोस्ट 2-3 टन/हेक्टेयर और नीम की खली 5 क्विंटल/हेक्टेयर प्रयोग करें।
सिंचाई प्रबंधन
अरहर सामान्यतः वर्षा आधारित फसल है, लेकित आवश्यकतानुसार सिंचाई करने से उपज में वृद्धि होती है:
महत्वपूर्ण सिंचाई अवस्थाएं:
- बुवाई के 3-4 सप्ताह बाद (यदि वर्षा न हो)
- शाखाएं निकलते समय (35-40 दिन)
- फूल आने की अवस्था (60-70 दिन)
- फलियाँ बनते समय (90-100 दिन)
पानी बचाने की तकनीक: ड्रिप सिंचाई या फव्वारा विधि से 30-40% पानी की बचत होती है।
खरपतवार प्रबंधन
फसल की प्रारंभिक अवस्था में खरपतवार नियंत्रण आवश्यक है:
- पहली निराई-गुड़ाई: बुवाई के 20-25 दिन बाद
- दूसरी निराई-गुड़ाई: 40-45 दिन बाद
- रासायनिक नियंत्रण: पेंडीमेथालिन 1 किग्रा सक्रिय तत्व/हेक्टेयर बुवाई के तुरंत बाद
कीट और रोग प्रबंधन
प्रमुख कीट:
- फली छेदक: नीम आधारित कीटनाशक (नीमगार्ड 5 मिली/लीटर) या इंडोसल्फान 0.07%
- पत्ती लपेटक कीट: क्विनलफॉस 0.05% का छिड़काव
प्रमुख रोग:
- फ्यूजेरियम विल्ट: ट्राइकोडर्मा 5 किग्रा/हेक्टेयर मिट्टी में मिलाएं
- स्टेम ब्लाइट: मैंकोजेब 0.2% का छिड़काव
अंतरवर्ती खेती
अरहर के साथ अंतरवर्ती खेती करके आय दोगुनी की जा सकती है:
- अरहर + सोयाबीन (2:2 अनुपात)
- अरहर + मूंग (पंक्ति छोड़कर)
- अरहर + तिल (सीमांत भूमि में)
कटाई और भंडारण
फसल पकने का संकेत जब 80% फलियाँ भूरी हो जाएँ और पत्तियाँ पीली पड़कर गिरने लगें:
- कटाई: फसल को जड़ सहित या डंठल से काटें
- सुखाने: 4-5 दिन धूप में सुखाएं
- मड़ाई: डंडों से पीटकर या मड़ाई मशीन से
- भंडारण: नमी 10% से कम होने पर भंडारित करें
उपज और आर्थिक लाभ
वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर:
- पारंपरिक विधि: 8-12 क्विंटल/हेक्टेयर
- उन्नत विधि: 20-30 क्विंटल/हेक्टेयर
- आय: प्रति हेक्टेयर 50,000-80,000 रुपये शुद्ध लाभ
सरकारी योजनाएं और अनुदान
केंद्र और राज्य सरकारें अरहर की खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रही हैं:
- बीज अनुदान: उन्नत किस्मों के बीज पर 50% तक अनुदान
- खाद अनुदान: जैविक खाद और जैव उर्वरक पर सब्सिडी
- सिंचाई सुविधा: ड्रिप/स्प्रिंकलर पर 80% तक अनुदान
नवीनतम तकनीकें और भविष्य की संभावनाएं
- एरोप्रोनिक तकनीक: बिना मिट्टी के अरहर उत्पादन
- जीनोम संपादन: उच्च पोषण मूल्य वाली किस्में
- ऑर्गेनिक अरहर: निर्यात के लिए बेहतर अवसर
निष्कर्ष
अरहर की खेती में दोगुनी पैदावार पाने के लिए समन्वित फसल प्रबंधन आवश्यक है। सही किस्म चुनने, समय पर बुवाई, संतुलित खाद प्रबंधन, समय पर सिंचाई और समेकित कीट प्रबंधन से किसान न सिर्फ उपज बढ़ा सकते हैं, बल्कि लागत कम करके मुनाफा भी बढ़ा सकते हैं। खरीफ सीजन में अरहर की वैज्ञानिक खेती किसानों की आय दोगुनी करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
स्मरण रखें: स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र से सलाह लेकर ही खाद, कीटनाशक और सिंचाई का प्रबंधन करें। मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही खाद का प्रयोग सबसे प्रभावी होता है।