कम पानी में भरपूर पैदावार: सूखे इलाकों के लिए बेस्ट धान की किस्में

भारत में पानी की कमी एक बड़ी समस्या बनती जा रही है, खासकर धान की खेती के लिए। पारंपरिक धान की किस्मों को प्रति हेक्टेयर 3,000-5,000 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, जो कि सूखाग्रस्त इलाकों के किसानों के लिए एक बड़ी चुनौती है। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने ऐसी धान की किस्में विकसित की हैं जिन्हें कम पानी में भी उगाया जा सकता है और अच्छी उपज प्राप्त की जा सकती है।

कम पानी में भरपूर पैदावार: सूखे इलाकों के लिए बेस्ट धान की किस्में

Table of Contents

सूखा सहनशील धान की किस्मों का महत्व

सूखा सहनशील धान की किस्में उन क्षेत्रों के लिए वरदान हैं जहाँ:

  • वर्षा कम होती है
  • सिंचाई सुविधाएं सीमित हैं
  • भूजल स्तर नीचे चला गया है
  • जलवायु परिवर्तन के कारण अनियमित वर्षा होती है

शीर्ष कम पानी वाली धान की किस्में

1. सहभागी धान (Sahbhagi Dhan) – आईआर-74371-70-1-1

विशेषताएँ:

  • विकसित: भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR) और इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI)
  • अवधि: 105-110 दिन
  • उपज क्षमता: 4-5 टन/हेक्टेयर
  • पानी की आवश्यकता: सामान्य किस्मों से 30-40% कम
  • विशेष गुण: सूखा सहनशील, पत्तियाँ सूखने पर भी पुनर्जीवित हो सकती हैं
  • उपयुक्त क्षेत्र: झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल के सूखा प्रभावित क्षेत्र

2. शुष्क धान (Shushk Samrat)

विशेषताएँ:

  • विकसित: नागपुर स्थित केंद्रीय उष्णकटिबंधीय फल अनुसंधान संस्थान
  • अवधि: 95-100 दिन
  • उपज क्षमता: 3.5-4.5 टन/हेक्टेयर
  • पानी की आवश्यकता: केवल 4-5 सिंचाईयों की आवश्यकता
  • विशेष गुण: उच्च तापमान सहनशील, रोग प्रतिरोधी
  • उपयुक्त क्षेत्र: महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात के शुष्क क्षेत्र

3. आईआर-64 धान (IR64 Dhan)

विशेषताएँ:

  • विकसित: इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI)
  • अवधि: 110-115 दिन
  • उपज क्षमता: 5-6 टन/हेक्टेयर
  • विशेष गुण: मध्यम सूखा सहनशील, उच्च गुणवत्ता वाले दाने
  • उपयुक्त क्षेत्र: तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश

4. एनडीआर-97 धान (NDR-97)

विशेषताएँ:

  • विकसित: नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय, फैजाबाद
  • अवधि: 120-125 दिन
  • उपज क्षमता: 4-4.5 टन/हेक्टेयर
  • विशेष गुण: जलभराव सहनशील, सूखा प्रतिरोधी
  • उपयुक्त क्षेत्र: उत्तर प्रदेश, बिहार के कम पानी वाले क्षेत्र

5. सीएसआर-10 धान (CSR-10)

विशेषताएँ:

  • विकसित: सेंट्रल सॉइल सैलिनिटी रिसर्च इंस्टीट्यूट, करनाल
  • अवधि: 115-120 दिन
  • उपज क्षमता: 4-4.5 टन/हेक्टेयर
  • विशेष गुण: लवणता सहनशील, सूखा प्रतिरोधी
  • उपयुक्त क्षेत्र: हरियाणा, पंजाब, राजस्थान के लवणीय क्षेत्र

6. एमआई टी-12 धान (MIT-12)

विशेषताएँ:

  • विकसित: महाराष्ट्र कृषि विश्वविद्यालय
  • अवधि: 100-105 दिन
  • उपज क्षमता: 3.5-4 टन/हेक्टेयर
  • विशेष गुण: अति शीघ्र पकने वाली, कम पानी में उगाई जा सकती है
  • उपयुक्त क्षेत्र: महाराष्ट्र के मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्र

कम पानी में धान उगाने की उन्नत विधियाँ

1. सिस्टम ऑफ राइस इंटेंसिफिकेशन (SRI) विधि

लाभ:

  • 30-50% पानी की बचत
  • 20-50% उपज वृद्धि
  • कम बीज लगता है

तकनीक:

  • 8-12 दिन के पौध रोपण
  • एक पौधा प्रति बिंदु
  • 25×25 सेमी की दूरी
  • अंतर-सिंचाई विधि

2. ड्रिप सिंचाई विधि

लाभ:

  • 60-70% पानी की बचत
  • उर्वरक की बचत
  • खरपतवार कम

क्रियान्वयन:

  • ड्रिप लाइनों को 60 सेमी की दूरी पर बिछाएँ
  • पौधों को ड्रिप के पास रोपें
  • आवश्यकतानुसार पानी दें

3. ड्राई डायरेक्ट सीडिंग राइस (DDSR)

लाभ:

  • नर्सरी तैयार करने की आवश्यकता नहीं
  • 30% पानी की बचत
  • समय की बचत

तकनीक:

  • सीधे खेत में बीज बोना
  • खेत को समतल करना
  • उचित नमी बनाए रखना

4. एरोबिक राइस कल्टीवेशन

लाभ:

  • 50% पानी की बचत
  • मिट्टी की सेहत में सुधार

तकनीक:

  • धान को गेहूं की तरह उगाना
  • खेत में पानी न भरना
  • नमी बनाए रखना

राज्यवार अनुशंसित किस्में

महाराष्ट्र:

  1. सहभागी धान
  2. एमआई टी-12
  3. शुष्क सम्राट
  4. आईआर-64

मध्य प्रदेश:

  1. सहभागी धान
  2. जेआर-81
  3. आईआर-64
  4. एनडीआर-97

राजस्थान:

  1. सीएसआर-10
  2. सीएसआर-27
  3. सीएसआर-30
  4. सहभागी धान

उत्तर प्रदेश:

  1. एनडीआर-97
  2. सरजू-52
  3. आईआर-64
  4. सहभागी धान

झारखंड और छत्तीसगढ़:

  1. सहभागी धान
  2. बीआर-8
  3. आईआर-64
  4. लालमटिया

कम पानी में धान उगाने के टिप्स

1. मिट्टी तैयारी:

  • खेत को अच्छी तरह समतल करें
  • जैविक खाद का प्रयोग करें
  • मल्चिंग करें ताकि नमी बनी रहे

2. बुआई का समय:

  • मानसून की शुरुआत में बोएं
  • मौसम पूर्वानुमान के अनुसार योजना बनाएं

3. सिंचाई प्रबंधन:

  • क्रांतिक अवस्थाओं पर पानी दें:
  • कल्ले निकलते समय
  • फूल आते समय
  • दाना बनते समय
  • अंतर-सिंचाई विधि अपनाएं

4. खरपतवार नियंत्रण:

  • समय पर निराई-गुड़ाई करें
  • जैविक मल्च का प्रयोग करें

5. पोषक तत्व प्रबंधन:

  • मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरक दें
  • जैविक खाद का अधिक प्रयोग करें
  • हरी खाद अपनाएं

सरकारी सहायता योजनाएँ

1. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना:

  • ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम पर सब्सिडी
  • जल संचयन संरचनाओं का निर्माण

2. राष्ट्रीय कृषि विकास योजना:

  • सूखा सहनशील किस्मों पर अनुदान
  • जल संरक्षण प्रशिक्षण

3. राज्य सरकार की योजनाएँ:

  • बीज सब्सिडी
  • कृषि उपकरणों पर अनुदान
  • बीमा सुरक्षा

लाभकारी सूक्ष्म सिफारिशें

1. मल्चिंग तकनीक:

  • पुआल या प्लास्टिक मल्च का प्रयोग
  • नमी संरक्षण में 40-60% सुधार

2. जल संचयन:

  • खेत में छोटे तालाब बनाएँ
  • वर्षा जल संग्रहण करें

3. फसल चक्र:

  • धान के बाद दलहनी फसलें लगाएँ
  • मिट्टी की नमी बनाए रखें

4. जैविक खेती:

  • केंचुआ खाद का प्रयोग
  • जैविक मल्चिंग

भविष्य की संभावनाएँ

1. जीन एडिटिंग तकनीक:

  • और अधिक सूखा सहनशील किस्में
  • पोषक तत्वों से भरपूर धान

2. स्मार्ट सिंचाई प्रणाली:

  • सेंसर आधारित सिंचाई
  • मोबाइल ऐप से नियंत्रण

3. जलवायु अनुकूलन:

  • बदलती जलवायु के अनुसार किस्में
  • टिकाऊ कृषि पद्धतियाँ

निष्कर्ष

कम पानी में धान की खेती आज की आवश्यकता है। उपरोक्त किस्मों और तकनीकों को अपनाकर किसान न केवल पानी बचा सकते हैं बल्कि अच्छी उपज भी प्राप्त कर सकते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि किसान अपने क्षेत्र के लिए उपयुक्त किस्म का चयन करें और वैज्ञानिक तरीके से खेती करें।

सूखा सहनशील धान की किस्में न केवल पानी बचाती हैं बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से भी निपटने में मदद करती हैं। इन किस्मों को अपनाकर किसान अपनी आय बढ़ा सकते हैं और कृषि को टिकाऊ बना सकते हैं।

अंत में, यह सलाह दी जाती है कि किसान स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय से परामर्श लेकर ही किस्मों का चयन करें और उन्नत खेती के तरीके अपनाएं।

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